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Ekagrata Se Praptiya - एकाग्रता से प्राप्तियां

 🧘🇲🇰  एकाग्रता से प्राप्तियां :



🌟 एकाग्रता से सवॅ शक्तियों की प्राप्तियां होती है।


🌟 एकाग्रता से नवीनता की इन्वेंशन कर सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से किसी का भी आह्वान कर सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से किसी भी आत्मा को दूर बैठे सहयोग दे सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से किसी भी आत्मा की आवाज कैच कर सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से किसी भी आत्मा का मेसेज उस आत्मा तक पहुंचा सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से श्रेष्ठता और स्पष्टता स्वत: होगी।


🌟 एकाग्रता से स्वत: ही एक बाप दूसरों न कोई अनुभूति होती है।


🌟 एकाग्रता से परखने की और निणॅय करने की शक्ति स्वत: ही बढ़ती है।


🌟 एकाग्रता से एक बाप में सारे संसार की सवॅ प्राप्तियों की अनुभूति कर सकते हैं।


🌟 एकाग्रता से अशांत, दुःखी आत्मा को दूर बैठे भी शांति की शक्ति दे सकते हैं।


🌟 एकाग्रता की शक्ति सहज ही निर्विघ्न बना देती है।


🌟 एकाग्रता की शक्ति सहज ही अव्यक्त फ़रिश्ता स्थिति की अनुभूति करा सकती है।


🌟 एकाग्रता की शक्ति से स्वत: ही सवॅ प्रति स्नेह, कल्याण और सम्मान की वृत्ति रहती है।


🌟 एकाग्रता की शक्ति से सवॅ प्रति भाई भाई की दृष्टि स्वत: ही बन जाती है।


🌟 एकाग्रता से सहज सफलता प्राप्त होती है।


🌟 एकाग्रता अनेक तरफ का भटकना स्वत: ही छुड़ा देती है।


🌟 एकाग्रता शक्ति शाली स्थिति का अनुभव कराती है।


🌟 एकाग्रता बाप समान स्थिति का अनुभव कराती है।


🌟 एकाग्रता सिद्धि स्वरूप बनाती है।


🌟 एकाग्रता मनसा सेवा करने में सहायता करती हैं।


🌟 एकाग्रता से एकरस स्थिति का अनुभव होता है।


🌟 एकाग्रता से सदा उड़ती कला का अनुभव होता है।


             ओम शांति

दुःखों की List - Spiritual Education - Brahma Kumaris

 दुःखों की list 



1. स्वास्थ्य ठीक न होना 

2. असाध्य रोग 

3. प्रियजनों की मृत्यु 

4. जीवघात या आत्मघात 

5. गरीबी 

6. बेरोजगारी 

7. बिजनेस में घाटा 

8. मृत्यु का भय 

9. अपनों को खोने का भय 

10. पढाई का बोझ 

11. पढ़ाई में असफलता 

12. परिवार में खिटपिट 

13. संबंधों में तनाव 

14. एक्सीडेंट 

15. अकाले मृत्यु 

16. अपाहिज होना 

17. बुद्धि की कमी 

18. डिप्रेशन आदि मानसिक रोग 

19. भीषण गर्मी या सर्दी 

20. Past का चिंतन 

21. भविष्य की चिंता 

22. दूसरे के सुखों से दुःख 

23. दूसरों की सफलता से ईर्ष्या 

24. किसी द्वारा अपमानित होना 

25. संतान न होना 

26. संतान का शरीर छोड़ देना 

27. बच्चों का आज्ञाकारी न होना 

28. बच्चों के career की चिंता 

29. बच्चों की सुरक्षा की चिंता 

30. कुरूप होना 

31. माता पिता द्वारा डाँट फटकार 

32. Cretch में रहना 

33. अपने career की चिंता 

34. अकेलापन 

35. परीक्षा में कम नंबर आना 

36. मनपसंद job न मिलना 

37. अनाथ होना 

38. रैगिंग होना 

39. बेवजह उदासी 

40. महामारी फैलना 

41. असहनीय पीड़ा 

42. Boss द्वारा exploitation 

43. मालिक द्वारा फटकार 

44. अशिक्षित होना 

45. अत्यधिक इच्छाएँ होना 

46. आशाएं पूरी न होना 

47. भयानक स्वप्न 

48. नींद न आना 

49. प्राकृतिक आपदाओं का आना 

50. मच्छर मक्खी का होना 

51. कुत्ते का काटना 

52. हिंसक जानवरों का भय

53. बुढ़ापे में अकेले रह जाना 

54. बच्चों द्वारा सेवा न मिलना 

55. आतंकवाद 

56. विश्व-युद्ध का भय 

57. योग्य वर न मिलना 

58. योग्य वधु न मिलना 

59. विधवा होना 

60. पति द्वारा विश्वासघात 

61. पत्नी द्वारा विश्वासघात

62. तलाक 

63. बाल विवाह 

64. ल़डकियों में भेद करना 

65. महिलाओं का शोषण 

66. महिलाओ की असुरक्षा 

67. दहेज के लिए सताना 

68. मित्र का दगा करना 

69. जीवन मे नीरसता 

70. भोजन में मिलावट 

71. महंगाई 

72. अनेक धर्मों में मतभेद 

73. चोरी होना 

74. अत्याधिक competition

75. झूठा प्रेम 

76. व्यसनों में डूबना 

77. भीख माँगना 

78. अकाल पड़ना 

79. Evil soul का प्रवेश करना 

80. तंत्र मंत्र के प्रभाव में आ जाना 

81. गुरुओं द्वारा ठगे जाना 

82. शरीर छूटने में तकलीफ 

83. संग दोष में पड़ जाना 

84. कन्या के विवाह के लिए धन न होना 

85. झूठा इल्ज़ाम में फँस जाना 

86. झूठा कलंक लग जाना 

87. अकाल पड़ जाना

88. कर्फ्यू आदि लगना 

89. रिश्वतखोरी 

90. विश्वासघात मिलना 

91. अंध विश्वासों में पड़ने से समस्याएँ 

92. देश विदेश के दुखद समाचार 

93. बच्चों का अपहरण 

94. Blackmailing

95. तिरस्कार होना 

96. मनोबल की कमी के कारण दुःख 

97. ईश्वर पर विश्वास न होना 

98. सामाजिक pressure 

98. परिवार व office में politics 

99. स्वयं को असमर्थ महसूस करना

100. Traffic jam के कारण तनाव 

101.प्रदूषण. 


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जिस्म से प्यार - खुदा से प्यार - Points From Murli - Brahma Kumaris

जिस्म से प्यार


* खुदा से प्यार *


किसी के प्यार में क्यूं इतने आंसू बहाता है ,


एक प्यारे खुदा का क्यों नहीं बन जाता है


जिस्मानी प्यार जिस्म के साथ मिट जाएगा ,


एक जिस्म मिटा तो दूसरा जिस्म लुभाएगा


जिस्म बदलते ही तेरा प्यार भी बदल जाएगा ,


ऐसे में तूँ अपनी मंजिल से भटकता जाएगा


छोड़ अब जिस्मानी प्यार बात मेरी मान ले ,


भूलकर जिस्म को तूँ खुद को रूह जान ले


छोड़ दे अपनी हर ख्वाहिशें जो विनाशी है ,


एक खुदा का रूहानी प्यार ही अविनाशी है


जिस्म मिटा तो ये कसमे वादे भी मिट जाएंगे ,


कर ले खुदा से प्यार जो जन्नत तुझे दिलाएंगे


ॐ शांति

01-06-2024

“मीठे बच्चे - तुम सब आपस में रूहानी भाई-भाई हो, तुम्हारा रूहानी प्यार होना चाहिए, आत्मा का प्यार आत्मा से हो, जिस्म से नहीं''

15-02-2023

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठकर रूहों को समझाते हैं अर्थात् बच्चों को समझाते हैं। बाप कहते हैं मुझे भी जिस्म है तब तो बात कर सकता हूँ। तुम भी ऐसे समझो मैं आत्मा हूँ, इस जिस्म द्वारा सुन रहा हूँ।

28-11-1969

एक ही शब्द में यह कहेंगे कि दृष्टि और वृत्ति में रूहानियत आ जाती है । अर्थात् दृष्टि वृत्ति रुहानी हो जाती हैं । जिस्म को नहीं देखते हैं तो शुद्ध, पवित्र दृष्टि हो जाती है । जड़ चीज़ को आँखों से देखेंगे ही नहीं तो उस तरफ वृत्ति भी नहीं जायेगी । दृष्टि नहीं जायेगी तो वृत्ति भी नहीं जायेगी । दृष्टि देखती है तब वृत्ति भी जाती है । रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को और दूसरों को भी रूह देखना चाहिए । जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना है, ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए । जैसे कोई बहुत गूढ़ विचार में रहते है, कुछ भी करते है, चलते, खाते-पीते है लेकिन उनको मालूम नहीं पड़ता है कि कहाँ तक आ पहुँचा हूँ, क्या खाया है । इसी रीति से जिस्म को देखते हुए भी नहीं देखेंगे और अपने उस रूह को देखने में ही बिजी होंगे तो फिर ऐसी अवस्था हो जायेगी जो कोई भी आपसे पूछेंगे यह कैसी थी तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा । ऐसी अवस्था होगी । लेकिन वह तब होगी जब जिस्मानी चीज़ को देखते हुए उस जिस्मानी लौकिक चीज़ को अलौकिक रूप में परिवर्तन करेंगे । अपने में परिवर्तन करने के लिए जो लौकिक चीज़ें देखते हो या लौकिक सम्बन्धियों को देखते हो उन सभी को परिवर्तन करना पड़ेगा । लौकिक में अलौकिकता की स्मृति रखेंगे । भल लौकिक सम्बन्धियों को देखते हो लेकिन यह समझो कि अब हमारी यह भी ब्रह्मा बाप के बच्चे पिछली बिरादरी है । ब्रह्मा वंश तो है ना । क्योंकि ब्रह्मा दी क्रियेटर है, तो भक्त, ज्ञानी व अज्ञानी हैं लेकिन बिरादरी तो वह भी हैं  ना । तो लौकिक सम्बन्धी भी ब्रह्मावंशी हैं लेकिन वह नजदीक सम्बन्ध के हैं, वह दूर के हैं । इसी रीति कोई भी लौकिक चीज़ देखते हो, दफ्तर में काम करते हो, बिजनेस करते हो, खाना खाते हो, देखते हो, बोलते हो लेकिन एक-एक लौकिक बात में अलौकिकता हो । इसी शरीर के कार्य के लिए चल रहे हो तो साथ-साथ समझो इन शारीरिक पाँव द्वारा लौकिक कार्य तरफ जा रहा हूँ लेकिन बुद्धि द्वारा अपने अलौकिक देश, कल्याण के कार्य के लिए जा रहा हूँ । पाँव यहाँ चल रहे हैं लेकिन बुद्धि याद की यात्रा में । शरीर को भोजन दे रहे हैं लेकिन आत्मा को फिर याद का भोजन देते जाओ । यह याद भी आत्मा का भोजन है । जिस समय शरीर को भोजन देते हो ऐसे ही शरीर के साथ में आत्मा को भी शक्ति का, याद का बल देना है ।

25-04-2023

तुम जानते हो हम सभी मेल अथवा फीमेल एक शिव परमात्मा की सजनियां आत्मायें हैं। साजन है एक परमात्मा। फिर जिस्म के हिसाब से हम शिवबाबा के पोत्रे और पोत्रियां हैं। हमारा उनकी प्रापर्टी पर पूरा हक लगता है। हम 21 जन्म के लिए सदा सुख की प्रापर्टी दादे से लेते हैं – यह हैं पेचदार बातें।

ओम् शान्ति। जिस्मानी यात्रा और रूहानी यात्रा पर यह गीत बनाया है भक्ति मार्ग वालों ने। जो पास्ट में हो गया है उसका गायन करते हैं। जो भी मनुष्य मात्र हैं उन सभी को जिस्मानी यात्रा का तो पता है। देखते हैं जन्म-जन्मान्तर से चक्र लगाते आये हैं। उन्हों की बुद्धि में बद्रीनाथ, श्रीनाथ … आदि ही याद रहता है। तुम बच्चों को भी यह जिस्मानी यात्रा आदि याद थी और अभी भी याद है। तुमने यात्रायें जन्म-जन्मान्तर की हैं। अब तुम बच्चों की बुद्धि में रूहानी यात्रा का ज्ञान है। मनुष्यों का बुद्धियोग है स्थूल जिस्मानी यात्रा तरफ। तुम्हारा बुद्धियोग है रूहानी यात्रा तरफ। रात-दिन का फ़र्क है। अभी तुम रूहानी यात्रा तरफ कदम बढ़ा रहे हो।

मेल अथवा फीमेल सभी सजनियां हैं। वैसे मेल्स को कोई सजनी थोड़ेही कहेंगे। परन्तु यह है बहुत गुह्य पेचदार बातें। तुम अपने को शिवबाबा के पोत्रे समझते हो – जबकि जिस्म में हो तो इस हिसाब से पोत्रे पोत्रियां ही ठहरे।

यहाँ दादा भी मौजूद है। अवतार भी जरूर यहाँ ही लेगा ना। तुम कहेंगे यहाँ हमारा दादा हमको पढ़ाते हैं। वह परमधाम से आते हैं। वह हमारा दादा है रूहानी और सब जिस्मानी दादे होते हैं। तो दादा कहते खुशी में एकदम उछल पड़ना चाहिए।

आत्मा को मेहनत करनी पड़ती है। रोटी पकाना, धन्धा आदि करना.. यह सब आत्मा करती है। अब बाबा आत्माओं को इस रूहानी धन्धे में लगाते हैं। साथ-साथ जिस्मानी धन्धा भी करना है। बाल बच्चों को सम्भालना है। ऐसे नहीं बाबा हम आपके हैं, यह बच्चे आदि आपको सम्भालना होगा। सबको बाबा सम्भाले, तो इतना बड़ा मकान भी न मिल सके।

18-05-2018

मीठे बच्चे – कभी जिस्म (साकार शरीर) को याद नहीं करना है, ऑखों से भल इन्हें देखते हो परन्तु याद सुप्रीम टीचर शिवबाबा को करना है”

22-07-2018

जैसे वाणी में आने का अभ्यास हो गया है, वैसे रूहानियत का अभ्यास बढ़ाओ तो वाणी में आने का दिल नहीं होगा।जो सम्पूर्ण समर्पण हो जाता है उसकी वृत्ति-दृष्टि शुद्ध हो जाती है, उसमें रूहानियत की शक्ति आ जाती है। वे जिस्म को नहीं देखते हैं। पहले दृष्टि देखती है तब वृत्ति जाती है। रूहानी दृष्टि अर्थात् अपने को वा दूसरों को भी रूह देखना। जिस्म तरफ देखते हुए भी नहीं देखना, अब ऐसी प्रैक्टिस होनी चाहिए। समय प्रमाण अब हर एक नई रौनक देखना चाहते हैं इसलिए हर कर्म में, हर संकल्प में, वाणी में रूहानियत की शक्ति धारण करो लेकिन रूहानियत सदा कायम तब रहेगी जब स्वयं को और दूसरों को, जिनकी सर्विस के लिये निमित्त हो, उन्हें बापदादा की अमानत समझ कर चलेंगे।

About Me - BK Ravi Kumar

I am an MCA, IT Professional & Blogger, Spiritualist, A Brahma Kumar at Brahmakumaris. I have been blogging here.